रविवार, 12 जून 2022

सलिल की रचनाएँ १२ जून

 गीत

शिरीष के फूल
*
फूल-फूल कर बजा रहे हैं
बीहड़ में रमतूल,
धूप-रूप पर मुग्ध, पेंग भर
छेड़ें झूला झूल
न सुधरेंगे
शिरीष के फूल।
*
तापमान का पान कर रहे
किन्तु न बहता स्वेद,
असरहीन करते सूरज को
तनिक नहीं है खेद।
थर्मामीटर नाप न पाये
ताप, गर्व निर्मूल
कर रहे हँस
शिरीष के फूल।।
*
भारत की जनसँख्या जैसे
खिल-झरते हैं खूब,
अनगिन दुःख, हँस सहे न लेकिन
है किंचित भी ऊब।
माथे लग चन्दन सी सोहे
तप्त जेठ की धूल
तार देंगे
शिरीष के फूल।।
*
हो हताश एकाकी रहकर
वन में कभी पलाश,
मार पालथी, तुरत फेंट-गिन
बाँटे-खेले ताश।
भंग-ठंडाई छान फली संग
पीकर रहते कूल,
हमेशा ही
शिरीष के फूल।।
*
जंगल में मंगल करते हैं
दंगल नहीं पसंद,
फाग, बटोही, राई भाते
छन्नपकैया छंद।
ताल-थाप, गति-यति-लय साधें
करें न किंचित भूल,
नाचते सँग
शिरीष के फूल।।
*
संसद में भेजो हल कर दें
पल में सभी सवाल,
भ्रमर-तितलियाँ गीत रचें नव
मेटें सभी बबाल।
चीन-पाक को रोज चुभायें
पैने शूल-बबूल
बदल रँग-ढँग
शिरीष के फूल।।
***
मुक्तक
नेह नर्मदा में अवगाहो, तन-मन निर्मल हो जाएगा।
रोम-रोम पुलकित होगा प्रिय!, अपनेपन की जय गाएगा।।
हर अभिलाषा क्षिप्रा होगी, कुंभ लगेगा संकल्पों का,
कोशिश का जनगण तट आकर, फल पा-देकर तर जाएगा।।
७-६-२०१६
***
एक रचना
ठेंगा
*
ठेंगे में 'ठ', ठाकुर में 'ठ', ठठा हँसा जो वह ही जीता
कौन ठठेरा?, कौन जुलाहा?, कौन कहाँ कब जूते सीता?
बिन ठेंगे कब काम चला है?, लगा, दिखा, चूसो या पकड़ो
चार अँगुलियों पर भारी है ठेंगा एक, न उससे अकड़ो
ठेंगे की महिमा भारी है, पूछो ठकुरानी से जाकर
ठेंगे के संग जीभ चिढ़ा दें, हो जाते बेबस करुणाकर
ठेंगा हाथों-लट्ठ थामता, पैरों में हो तो बेनामी
ठेंगा लगता, इसकी दौलत उसको दे देता है दामी
लोक देखता आया ठेंगा, नेता दिखा-दिखा है जीता
सीता-गीता हैं संसद में, लोकतंत्र को लगा पलीता
राम बाग़ में लंका जैसा दृश्य हुआ अभिनीत, ध्वंस भी
कान्हा गायब, यादव करनी देख अचंभित हुआ कंस भी
ठेंगा नितीश मुलायम लालू, ममता माया जया सोनिया
मौनी बाबा गुमसुम-अण्णा, आप बने तो मिले ना ठिया
चाय बेचकर छप्पन इंची, सीना बन जाता है ठेंगा
वादों को जुमला कहता है, अंधे को कहता है भेंगा
लोकतंत्र को लोभतंत्र कर, ठगता ठेंगा खुद अपने को
ढपली-राग हो गया ठेंगा, बेच रहा जन के सपने को
ठेंगे के आगे नतमस्तक, चतुर अँगुलियाँ चले न कुछ बस
ठेंगे ठाकुर को अर्पित कर भोग लगाओ, 'सलिल' मिले जस
१२-६-२०१६
***
छंद सलिला:
विधाता/शुद्धगा छंद
संजीव
*
छंद लक्षण: जाति यौगिक, प्रति पद २८ मात्रा,
यति ७-७-७-७ / १४-१४ , ८ वीं - १५ वीं मात्रा लघु
विशेष: उर्दू बहर हज़ज सालिम 'मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन' इसी छंद पर आधारित है.
लक्षण छंद:
विधाता को / नमन कर ले , प्रयासों को / गगन कर ले
रंग नभ पर / सिंधु में जल , साज पर सुर / अचल कर ले
सिद्धि-तिथि लघु / नहीं कोई , दिखा कंकर / मिला शंकर
न रुक, चल गिर / न डर, उठ बढ़ , सीकरों को / सलिल कर ले
संकेत: रंग =७, सिंधु = ७, सुर/स्वर = ७, अचल/पर्वत = ७
सिद्धि = ८, तिथि = १५
उदाहरण:
१. न बोलें हम न बोलो तुम , सुनें कैसे बात मन की?
न तोलें हम न तोलो तुम , गुनें कैसे जात तन की ?
न डोलें हम न डोलो तुम , मिलें कैसे श्वास-वन में?
न घोलें हम न घोलो तुम, जियें कैसे प्रेम धुन में?
जात = असलियत, पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात
२. ज़माने की निगाहों से , न कोई बच सका अब तक
निगाहों ने कहा अपना , दिखा सपना लिया ठग तक
गिले - शिकवे करें किससे? , कहें किसको पराया हम?
न कोई है यहाँ अपना , रहें जिससे नुमायाँ हम
३. है हक़ीक़त कुछ न अपना , खुदा की है ज़िंदगानी
बुन रहा तू हसीं सपना , बुजुर्गों की निगहबानी
सीखता जब तक न तपना , सफलता क्यों हाथ आनी?
कोशिशों में खपा खुदको , तब बने तेरी कहानी
४. जिएंगे हम, मरेंगे हम, नहीं है गम, न सोचो तुम
जलेंगे हम, बुझेंगे हम, नहीं है तम, न सोचो तुम
कहीं हैं हम, कहीं हो तुम, कहीं हैं गम, न सोचो तुम
यहीं हैं हम, यहीं हो तुम, नहीं हमदम, न सोचो तुम
*********
१२-६-२०१४
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अनुगीत, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामरूप, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गीता, गीतिका, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मदनाग, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विधाता, विरहणी, विशेषिका, विष्णुपद, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, शुद्धगा, शंकर, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

शनिवार, 10 जुलाई 2021

विमर्श : भाषिक शुद्धता

विमर्श : भाषिक शुद्धता
संजीव
*
भाषा वाहक भाव की, करे कथ्य अभिव्यक्त
शब्द यथोचित यदि नहीं, तो मानें है त्यक्त
अनुभूत को अभिव्यक्त करने का माध्यम है भाषा। बच्चा भाषा सीखता है माँ और स्वजनों से। माता-पिता दोनों की भाषिक पृष्ठ भूमि प्राय: भिन्न होती है। भाषा कोई भी हो लोक दैनंदिन कार्य व्यापार में विविध भाषाओं-बोलिओं के शब्दों का प्रयोग करता है। ग्रामीण बोली और बाजारू भाषा इसी तरह बनती है। अध्ययन की भाषा शिक्षा के स्तर और विषयानुसार रूप ग्रहण करती है। प्राथमिक स्तर का भाषा शोधकार्य के उपयुक्त नहीं हो सकती। इसी तरह प्राणीशास्त्र में प्रयुक्त भाषा वाणिज्य अथवा यांत्रिकी को लिए अनुपयुक्त होगी।
भाषिक शुद्धता का शब्दों से संबंध नहीं
सामान्यतः भाषिक शुद्धता के शब्द-प्रयोग से जोड़ दिया जाता है। मैं इससे सहमत नहीं हूँ। शब्द साझा होते हैं। मनुष्य जहाँ जाता है, जिनसे मिलता है, जो पढ़ता है, उससे शब्द ग्रहण करता है। वर्तमान में दूरदर्शन व अंतर्जाल ने 'छोटी सी ये दुनिया' की सोच को साकार कर दिया है। इसे शब्दों की यात्रा और सहज हो गयी है। जिस देश के पात्र, स्थान और लोकाचार की चर्चा की जाएगी, उस देश के शब्द प्रयोग में आएंगे ही। रूसी परिवेश की कहानी में रूस के पात्र, स्थान और लोकाचार स्वाभाविक है। वहाँ भारतीय वनस्पतियों, नामों, शहरों का उल्लेख अनुपयुक्त होगा। कहते हैं "पाँच कोस पे पानी बदले, बीस कोस पे बानी" अगर भाषा के स्वाभाविकता ही न होगी तो कृत्रिम भाषा से रसानंद कैसे मिलेगा?
भाषिक शुद्धता का आधार व्याकरण और पिंगल
भाषिक शुद्धता या अशुद्धता को देखने का आधार भाषा का व्याकरण और पिंगल होता है। हर भाषा की भिन्न प्रकृति और संस्कार होता है। हिंदी में २ लिंग हैं, संस्कृत में ३, अंग्रेजी में ४। भाषिक शुद्धता को महत्वहीन समझनेवाले यह बताएं की अंग्रेजी में हिंदी की तरह दो लिंग मानकर लिखा जाए तो उन्हें हजम होगा? यदि अंग्रेजी के पर्चे में परीक्षार्थी हिंदी की क्रिया, विशेषण आदि का प्रयोग करे तो उसे सही मानेंगे? अंग्रेजी में उचित शब्द होते हुए भी तमिल, मराठी या हिंदी के शब्द उपयोग करने पर अंक देंगे?
भाषिक संस्कार
इसी तरह हिंदी में जो सम्यक शब्द हैं उनका प्रयोग किया ही जाना चाहिए। गाँव के किसान 'गेहूं' की जगह 'व्हीट' कहे तो असहनीय होगा। लोक अन्य भाषिक शब्दों को अपने संस्कार में ढालता है। तभी 'मास्टर साहेब' को 'मास्साब', 'डॉक्टर साहेब' को 'डाक्साब' बनाकर ग्रहण कर लेता है। 'स्टेशन' को 'टेशन' कहे तो भी स्वाभाविकता बनी रहती है। किन्तु पौधरोपण की जगह 'प्लांटेशन' का प्रयोग भाषिक प्रदूषण ही है।
साहित्य में भाषा
लोक साहित्य के माध्यम से भाषा को संस्कारित करता है। साहित्य की भाषा लक्ष्य पाठक के अनुरूप होती है। हिंदी साहित्य के स्नातक को जिस भाषा में पढ़ाया जायेगा वह चिकित्सा के स्नातक विद्यार्थी के लिए प्रयोग नहीं की जा सकती। साहित्य में भाषिक शुद्धता का आग्रह बिलकुल उचित है। हिंदी में अंग्रेजी, अरबी-फ़ारसी शब्दों के आग्रही क्या अंग्रेजी रचना कर्म में हिंदी शब्दों का प्रयोग करेंगे? प्रो. अनिल जी ने 'ऑफ़ एन्ड ऑन' या 'द सेकेण्ड थॉट' में शुद्ध अंग्रेजी नहीं लिखी क्या? इन किताबों कितने हिंदी शब्द हैं? अंग्रेजी में लिखें तो भाषा शुद्ध हो, हिंदी में लिखें तो भाषिक शुद्धता का प्रश्न गलत कैसे ?
रचना का कथ्य और भाषा
बाल साहित्य की भाषा तकनीकी लेख या व्यंग्य लेख की तरह नहीं होगी। कबीर और तुलसी की भाषा में भिन्नता स्वाभाविक है और दोनों में से किसी को अशुद्ध नहीं कहा जाता। क्या रामचरित मानस ग़ालिब की भाषा में लिखा जा सकता है? सपना जी! बहुत विनम्रता से महान है कि उर्दू का तो कोई शब्द ही नहीं है। उर्दू शब्द कोष में सम्मिलित सब और हर शब्द किसी अन्य भाषा से लिया गया है। उर्दू हिंदी की एक शैली है जिसमें कुछ विदेशी (अरबी, फ़ारसी) और कुछ भारतीय भाषाओँ के शब्दों का संकलन है। इसी तरह जबलपुर के निकट पचेली बोली जाती है जिसमें ५ भारतीय भाषाओँ के शब्द सम्मिलित हैं।
भाषिक सहजता जरूरी
अनिल जी! यह सही है कि अनावश्यक क्लिष्टता नहीं होना चाहिए, पर यह लेखक की शैली से जुड़ा बिंदु है। मैथिलीशरण गुप्त और हजारी प्रसाद द्विवेदी दोनों की भाषा और शब्द चयन भिन्न हों तो दोनों में से किसी को निरस्त नहीं किया जा सकता जबकि एक की भाषा सरल दूसरे की क्लिष्ट है।
देवकांत जी से सहमत हूँ कि जहाँ भाषा में उपयुक्त शब्द हों वहाँ अनावश्यक अन्य भाषा के शब्दों का प्रयोग नहीं चाहिए।
सारांश जी की बात सही है। मिलमा दाल, सब्जी तो खाई जा सकती है पर खीर और कढ़ी को मिलाकर नहीं खाया जा सकता।
भाषा की नदी में सहायक नदियों क पानी मिले तो आपत्ति नहीं है किन्तु रासायनिक कारखाने का दूषित जल मिले तो आपत्ति करनी ही होगी।
पाखी जी हिंदी में शोध निरंतर हो रहा है। हमें अंग्रेजी से स्नेह रखते हुए अंग्रेजियत से दूरी बनानी होगी। अंग्रेजी के प्राध्यापक को भी पूरी तरह भारतीय संस्कार, हिंदी भाषा और स्थानीय बोली से जुड़ा होना चाहिए।
भाषी प्रदूषण गलत शब्द प्रयोग से भी होता है। रेल लेट है। इसे हिंदी कैसे स्वीकार करे? रेल का अर्थ पटरी होता है। ट्रेन का समानार्थी रेलगाड़ी है। जबलपुर आ रहा है। जबलपुर नहीं आता-जाता, आती-जाती रेलगाड़ी है। हमें भाषिक शुद्धता के प्रति सजग होना ही होगा। मेरी एक द्विपदी का आनंद लें-
क्या पूछते हो, राह यह जाती कहाँ है?
आदमी जाते हैं नादां रास्ते जाते नहीं हैं।
पौधरोपण का प्रयोग न कर वृक्षारोपण का प्रत्योग करने के पक्षधर क्या प्लांटेशन की जगह ट्री टेशन कहेंगे? हम हिंदी के प्रति स्वस्थ्य दृष्टिकोण अपनाएं और भाषिक शुद्धता, सरलता तथा सहजता को अपनाएँ यह आवश्यक है।
अभी कल ही मिजोरम विश्वविद्यालय द्वारा हिंदी में अनुवाद कार्य पर अन्तर्राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी थी। उसमें बुगरिया और अन्य देशों के विदेशी प्राध्यापक शुद्ध हिंदी पूरी तरह भारतीय लहजे में बोल रहे थे किन्तु कुलपति महोदय पूरे समय अंग्रेजी बोलते रहे। विदेशी प्राध्यापक द्वारा अंग्रेजी समझने में कठिनाई व्यक्त करने पर भी उन्हें अंग्रेजी बोलने में शर्म नहीं आई। अंत में भारतेन्दु के दोहे के साथ अपने बात समाप्त करता हूँ -
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के मिठे न हिय को सूल
* ।

" अभियांत्रिकी और साहित्य का अलौकिक संगम - संजीव वर्मा " सलिल "


" अभियांत्रिकी और साहित्य का अलौकिक संगम - संजीव वर्मा " सलिल " 

संजीव भैया के बारे में लिखना वैसा ही है, जैसे समुंदर की बूँदें गिनना - मैं उन्हें सदा भैया से संबोधित करता हूँ और मुझे भी उनसे एक बड़े भाई का प्यार और आशीर्वाद हमेशा मिला है I मेरी उनसे आरंभिक मुलाकात १६ मई २००४ को हुई थी, जब राष्ट्रीय संस्था आई. जी. एस. जबलपुर चैप्टर की स्थापना का विधिवत उद्घाटन हुआ था और तब शायद वो पी. डब्ल्यू. डी. शहडोल में पदस्थ थे I उसके बाद तो उनसे लगातार मुलाक़ातें होती रहीं I आई. जी. एस. जबलपुर चैप्टर के संस्थापक चेयरमैन प्रोफ़े . व्ही के श्रीवास्तव और मानसेवी सचिव डॉ दिनेश खरे के साथ उनसे मुलाक़ातों का क्रम शुरू हो गया , बाद में वो स्थानांतरित होकर जबलपुर आ गये, और फिर तो शहर की तमाम तकनीकी संस्थाओं यथा - इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स ( इंडिया) जबलपुर लोकल सेंटर, प्रेक्टसिंग इंजीनियर्स एसोशिएशन, आई.जी.एस. जबलपुर चैप्टर और अन्य सामाजिक एवम् साहित्यक संस्थाओं के कार्यक्रमों में लगातार उनसे मुलाक़ातें होती रही I आगे चलकर हमने आई.जी.एस. जबलपुर चैप्टर संस्था में साथ काम किया I उन्होने इस संस्था द्वारा आयोजित दो राष्ट्रीय सेमिनारों में प्रकाशित सोविनयर का संपादन किया, जिनमें वर्ष २००८ में बीटुमीन सरफ़ेस - डिजाइन कंस्ट्रक्शन और फेलुअर विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के लिए पत्रिका " मार्ग " और वर्ष २०११ में एडवान्सेस इन जियोटेकनिकल इंजीनियरिंग, कॉंक्रीट एंड मेसनरी कंस्ट्रक्शन विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के लिए पत्रिका " निर्माण " का सफल संपादन किया I अपने अनेकों सेमिनार में तकनीकी प्रपत्र प्रस्तुत किए है I

आपने हमेशा हमारी राजभाषा हिन्दी के उन्नयन के लिए कार्य किया I साहित्य की लगभग हर विधा के आप विद्वान है, ये हम सब जानते ही है, अभियांत्रिकी के क्षेत्र में भी आपने हमारा और हमारे नगर का गौरव बढ़ाया है I राष्ट्रीय संस्था इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया) के लिए आपके द्वारा संपादित राष्ट्रीय पत्रिका “अभियंता बंधु “ ने पूरे राष्ट्र में ख्याति प्राप्त की I आपके लिखे हिन्दी लेख को पूरे भारत वर्ष में सर्वोत्कृष्ट रचना के रूप में इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया) द्वारा आपको राष्ट्रीय पुरूस्कार से सम्मानित किया गया I वर्तमान में आप आई.जी.एस. जबलपुर चैप्टर संस्था के चेयरमैन के रूप में हम सबका मार्गदर्शन कर रहे है I बचपन से हम मैथिली शरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, महादेवी वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी, मुंशी प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों को पढ़कर बढ़े हुए है I हमें गर्व है, कि हम आचार्य संजीव वर्मा " सलिल " के युग में पैदा हुए और इन्हे देखने और सुनने का मौका मिला I हम आपके यशस्वी और स्वस्थ्य जीवन की प्रभु से प्रार्थना करते है I सादर - इंजी संजय वर्मा, मानसेवी सचिव - आई. जी. एस. जबलपुर चैप्टर - 9425803337 

समीक्षा 'काल है संक्रांति का, डॉ. रोहिताश्व अस्थाना

पुस्तक समीक्षा
आधुनिक समय का प्रमाणिक दस्तावेज 'काल है संक्रांति का'
समीक्षक- डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, हरदोई
*
गीत संवेदनशील हृदय की कोमलतम, मार्मिक एवं सूक्ष्मतम अभिव्यक्तियों की गेयात्मक, रागात्मक एवं संप्रेषणीय अभिव्यक्ति का नाम है। गीत में प्रायः व्यष्टिवदी एवं नवगीत में समष्टिवादी स्वर प्रमुख होता है। गीत के ही शिल्प में नवगीत के अंतर्गत नई उपमाओं, एवं टटके बिंबों के सहारे दुनिया जहान की बातों को अप्रतिम प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है। छन्दानुशासन में बँधे रहने के कारण गीत शाश्वत एवं सनातन विधा के रूप में प्रचलित रहा है किंतु प्रयोगवादी काव्यधारा के अति नीरस स्वरूप के विद्रोह स्वरूप नवगीत, ग़ज़ल, दोहा जैसी काव्य विधाओं का प्रचलन आरम्भ हुआ।
अभी हाल में भाई हरिशंकर सक्सेना कृत 'प्रखर संवाद', सत्येंद्र तिवारी कृत 'मनचाहा आकाश' तथा यश मालवीय कृत 'समय लकड़हारा' नवगीत के श्रेष्ठ संकलनों के रूप में प्रकाशित एवं चर्चित हुए हैं। इसी क्रम में समीक्ष्य कृति 'काल है संक्रांति का' भाई आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' के गीतों और नवगीतों की उल्लेखनीय प्रस्तुति है। सलिल जी समय की नब्ज़ टटोलने की क्षमता रखते हैं। वस्तुत: यह संक्रांति का ही काल है। आज सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों में टूटने एवं बिखरने तथा उनके स्थान पर नवीन मूल्यों की प्रतिस्थापना का क्रम जारी है। कवि ने कृति के शीर्षक में इन परिस्थितियों का सटीक रेखांकन करते हुए कहा है- "काल है संक्रांति / तुम मत थको सूरज / प्राच्य पर पाश्चात्य का / चढ़ गया है रंग / शराफत को शरारत / नित का कर रही है तंग / मनुज-करनी देखकर खुद नियति भी है दंग' इसी क्रम में सूरज को सम्बोधित कई अन्य गीत-नवगीत उल्लेखनीय हैं।
कवि सत्य की महिमा के प्रति आस्था जाग्रत करते हुए कहता है-
''तक़दीर से मत हों गिले
तदबीर से जय हों किले
मरुभूमि से जल भी मिले
तन ही नहीं, मन भी खिले
करना सदा- वह जो सही।''
इतना ही नहीं कवि ने सामाजिक एवं आर्थिक विसंगति में जी रहे आम आदमी का जीवंत चित्र खींचते हुए कहा है-
"मिली दिहाड़ी
चल बाजार।
चवल-दाल किलो भर ले ले,
दस रुपये की भाजी।
घासलेट का तेल लिटर भर
धनिया मिर्ची ताज़ी।"
सचमुच रोज कुआं खोदकर पानी पीनेवालों की दशा अति दयनीय है। इसी विषय पर 'राम बचाये' शीर्षक नवगीत की निम्न पंक्तियाँ भी दृष्टव्य है -
"राम-रहीम बीनते कूड़ा
रजिया-रधिया झाड़ू थामे
सड़क किनारे बैठे लोटे
बतलाते कितने विपन्न हम ?"
हमारी नयी पीढ़ी पाश्चात्य सभ्यता के दुष्प्रभाव में अपने लोक जीवन को भी भूलती जा रही है। कम शब्दों में संकेतों के माध्यम से गहरे बातें कहने में कुशल कवि हर युवा के हाथ में हर समय दिखेत चलभाष (मोबाइल) को अपसंस्कृति का प्रतीक बनाकर एक और तो जमीन से दूर होने पर चिंतित होते हैं, दूसरी और भटक जाने की आशंका से व्यथित भी हैं-
" हाथों में मोबाइल थामे
गीध-दृष्टि पगडण्डी भूली,
भटक न जाए।
राज मार्ग पर जाम लगा है
कूचे-गली हुए हैं सूने।
ओवन-पिज्जा का युग निर्दय
भटा कौन चूल्हे में भूने ?"
सलिल जी ने अपने कुछ नवगीतों में राजनैतिक प्रदूषण के शब्द-चित्र कमाल के खींचे हैं। वे विविध बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से बहुत कुछ ऐसा कह जाते हैं जो आम-ख़ास हर पाठक के मर्म को स्पर्श करता है और सोचने के लिए विवश भी करता है-
"लोकतंत्र का पंछी बेबस
नेता पहले दाना डालें
फिर लेते पर नोच।
अफसर रिश्वत-गोली मारें
करें न किंचित सोच।"
अथवा
"बातें बड़ी-बड़ी करते हैं,
मनमानी का पथ वरते हैं।
बना-तोड़ते संविधान खुद
दोष दूसरों पर धरते हैं।"
इसी प्रकार कवि के कुछ नवगीतों में छोटी-छोटी पंक्तियाँ उद्धरणीय बन पड़ी हैं। जरा देखिये- "वह जो खासों में खास है / रूपया जिसके पास है। ", "तुम बंदूक चलो तो / हम मिलकर कलम चलायेंगे। ", लेटा हूँ मखमल गादी पर / लेकिन नींद नहीं आती है। ", वेश संत का / मन शैतान। ", "अंध श्रृद्धा शाप है / बुद्धि तजना पाप है। ", "खुशियों की मछली को। / चिंता बगुला / खा जाता है। ", कब होंगे आज़ाद? / कहो हम / कब होंगे आज़ाद?" आदि।
अच्छे दिन आने की आशा में बैठे दीन-हीन जनों को सांत्वना देते हुए कवि कहता है- "उम्मीदों की फसल / उगाना बाकी है
अच्छे दिन नारों-वादों से कब आते हैं ?
कहें बुरे दिन मुनादियों से कब जाते हैं??"
इसी प्रकार एक अन्य नवगीत में कवि द्वारा प्रयुक्त टटके प्रतीकों एवं बिम्बों का उल्लेख आवश्यक है-
"खों-खों करते / बादल बब्बा
तापें सूरज सिगड़ी।
पछुआ अम्मा / बड़बड़ करतीं
डाँट लगातीं तगड़ी।"
निष्कर्षत: कृति के सभी गीत-नवगीत एक से बरहकर एक सुन्दर, सरस, भाव-प्रवण एवं नवीनता से परिपूर्ण हैं। इन सभी रचनाओं के कथ्य का कैनवास अत्यन्त ही विस्तृत और व्यापक है। यह सभी रचनाएँ छन्दों के अनुशासन में आबद्ध और शिल्प के निकष पर सौ टंच खरी उतरने वाली हैं।
कविता के नाम पर अतुकांत और व्याकरणविहीन गद्य सामग्री परोसनेवाली प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं को प्रस्तुत कृति आइना दिखने में समर्थ है। कुल मिलाकर प्रस्तुत कृति पठनीय ही नहीं अपितु चिन्तनीय और संग्रहणीय भी है। इस क्षेत्र में कवि से ऐसी ही सार्थक, युगबोधक परक और मन को छूनेवाली कृतियों की आशा की सकती है।
***
[पुस्तक परिचय - काल है संक्रांति का, गीत-नवगीत संग्रह, कवि आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रकाशक- समन्वय प्रकाशन अभियान, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ म. प्र., प्रकाशन वर्ष २०१६,मूल्य सजिल्द ३००/-, पेपरबैंक २००/-, चलभाष ९४२५१८३२४४]
समीक्षक- डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, निकट बावन चुंगी चौराहा, हरदोई २४१००१ उ. प्र. दूरभाष ०५८५२ २३२३९२।
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बेटी पचीसा

बेटी पचीसा
(बेटी पर २५ दोहे)
*
सपना है; अरमान है, बेटी घर का गर्व।
बिखरा निर्झर सी हँसी, दुख हर लेती सर्व।।
*
बेटी है प्रभु की कृपा, प्रकृति का उपहार।
दिल की धड़कन सरीखी, करे वंश-उद्धार।।
*
लिए रुदन में छंद वह, मधुर हँसी में गीत।
मृदुल-मृदुल मुस्कान में, लुटा रही संगीत।।
*
नन्हें कर-पग हिलाकर, मुट्ठी रखती बंद।
टुकुर-टुकुर जग देखती, दे स्वर्गिक आनंद।।
*
छुई-मुई चंपा-कली, निर्मल श्वेत कपास।
हर उपमा फीकी पड़े, दे न सके आभास।।
*
पूजा की घंटी-ध्वनि, जैसे पहले बोल।
छेड़े तार सितार के, कानों में रस घोल।।
*
बैठ पिता के काँध पर, ताक रही आकाश।
ऐंठ न; बाँधूगी तुझे, निज बाँहों के पाश।।
*
अँगुली थामी चल पड़ी, बेटी ले विश्वास।
गिर-उठ फिर-फिर पग धरे, होगा सफल प्रयास।।
*
बेटी-बेटा से बढ़े, जनक-जननि का वंश।
एक वृक्ष के दो कुसुम, दोनों में तरु-अंश।।
*
बेटा-बेटी दो नयन, दोनों कर; दो पैर।
माना नहीं समान तो, रहे न जग की खैर।।
*
गाइड हो-कर हो सके, बेटी सबसे श्रेष्ठ।
कैडेट हो या कमांडर, करें प्रशंसा ज्येष्ठ।।
*
छुम-छुम-छन पायल बजी, स्वेद-बिंदु से सींच।
बेटी कत्थक कर हँसी, भरतनाट्यम् भींच।।
*
बेटी मुख-पोथी पढ़े, बिना कहे ले जान।
दादी-बब्बा असीसें, 'है सद्गुण की खान'।।
*
दादी नानी माँ बुआ, मौसी चाची सँग।
मामी दीदी सखी हैं, बिटिया के ही रंग।।
*
बेटी से घर; घर बने, बेटी बिना मकान।
बेटी बिन बेजान घर, बेटी घर की जान।।
*
बेटी से किस्मत खुले, खुल जाती तकदीर।
बेटी पाने के लिए, बनते सभी फकीर।।
*
बेटी-बेटे में 'सलिल', कभी न करिए फर्क।
ऊँच-नीच जो कर रहे, वे जाएँगे नर्क।।
*
बेटी बिन निर्जीव जग, बेटी पा संजीव।
नेह-नर्मदा में खिले, बेटी बन राजीव।।
*
सुषमा; आशा-किरण है, बेटी पुष्पा बाग़।
शांति; कांति है; क्रांति भी, बेटी सर की पाग।।
*
ऊषा संध्या निशा ऋतु, धरती दिशा सुगंध।
बेटी पूनम चाँदनी, श्वास-आस संबंध।।
*
श्रृद्धा निष्ठा अपेक्षा, कृपा दया की नीति।
परंपरा उन्नति प्रगति, बेटी जीवन-रीति।।
*
ईश अर्चना वंदना, भजन प्रार्थना प्रीति।
शक्ति-भक्ति अनुरक्ति है, बेटी अभय अभीति।।
*
धरती पर पग जमाकर, छूती है आकाश।
शारद रमा उमा यही, करे अनय का नाश।।
*
दीपक बाती स्नेह यह, ज्योति उजास अनंत।
बेटी-बेटा संग मिल, जीतें दिशा-दिगंत।।
***
१०.७.२०१८, ७९९९५५९६१८

मोहन छंद

हिंदी ग़ज़ल / मुक्तिका
[रौद्राक जातीय, मोहन छंद, ५,६,६,६]
*
''दिलों के / मेल कहाँ / रोज़-रोज़ / होते हैं''
मिलन के / ख़्वाब हसीं / हमीं रोज़ / बोते हैं
*
बदन को / देख-देख / हो गये फि/दा लेकिन
न मन को / देख सके / सोच रोज़ / रोते हैं
*
न पढ़ अधि/क, ले समझ/-सोच कभी /तो थोड़ा
ना समझ / अर्थ राम / कहें रोज़ / तोते हैं
*
अटक जो / कदम गए / बढ़ें तो मि/ले मंज़िल
सफल वो / जो न धैर्य / 'सलिल' रोज़ / खोते हैं
*
'सलिल' न क/रिए रोक / टोक है स/फर बाकी
करम का / बोझ मौन / काँध रोज़ / ढोते हैं
***
९-७-२०१६

शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

आँख

आँख की महिमा भारी
*
आँख खुली तो जनम हो गओ, आँख मुँदी तो मरन।
आँख मिली झुक उठ लड़ गई तो, आँख लग गई लगन।।
आँख दिखाई बैर पल गओ, आँख लाल की जलन।
आँख नटेरी, आँख फूट गई, कोऊ नें रै गओ स्वजन।।
आँख से करिए यारी
आँख की महिमा भारी
*
आँख बस गओ हाय रे, आँख खों अंजन घाईं।
आँख बचाकर आँख नें, करी आँख पहुनाई।।
आँख आँख बैरन भईं, फूटी आँख नें भाईं।
आँख कलेजो चीरकर, रो-रो आँख गँवाईं।।
आँख कर रई अय्यारी
आँख की महिमा भारी
*
आँख समा गओ आप तो, टँसुआ आँख बहाए।
आँख भई मीरा मगन, सूर स्याम पतियाए।।
आँख दिवानी राधिका, नैना स्याम बसाए।
आँख चार भईं, फेर लईं, आँधर राह दिखाए।।
आँख है तेज कटारी
आँख की महिमा भारी
*
संजीव 
९४२५१८३२४४